भारत त्योहारों का देश है। यहाँ धर्म , जाति , राज्य की विभिन्नता होने के कारण प्रत्येक माह , प्रत्येक दिन कोई न कोई त्यौहार मनाया जाता है ,लकिन आश्चर्य की बात तो ये है कि इतनी सारी विविधता होने के बावजूद भी पूरे भारत में एक साथ मिल कर सारे त्यौहार मनाये जाते है। इन त्योहारों में से एक मुख्य त्यौहार है ——गणेश चतुर्थी, जिसे विनायक चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। गण + पति = गणपति। गण अर्थात पवित्रक + पति अर्थात स्वामी यानी पवित्रको के स्वामी। हिन्दू धर्म के अनुसार श्री गणेश देवताओ में अग्रणीय पूजनीय है।
निर्विघ्नं कुरू मे देव, सर्व कार्येषु सर्वदा।
श्री गणेश चतुर्थी भारत के विभिन्न भागो में बहुत ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है , लकिन महाराष्ट्र में इसे बहुत ही धूम -धाम के साथ मनाया जाता है और यह महोत्सव 10 दिन तक चलता है| शिव पुराण के अनुसार श्री गणेश की जन्म तिथि भाद्र माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। शिव पुराण के अंतर्गत ही रुद्रसहिंता के चतुर्थ खंड में श्री गणेश के जन्म के बारे में बताया गया है कि माता पार्वती कई वर्षो तक ध्यान में बैठे रहे , जिस दिन वो ध्यानमुक्त हुए , स्नान करने से पूर्व उन्होंने अपने तन की मैल से एक मिटटी का पुतला बनाया ,जिसमे देखते ही देखते जान आ गयी। स्नान करने जाते समय माता पार्वती ने उसे अपना द्वारपाल बना दिया। उसी समय शिव जी वहां आ गए और अंदर जाने की जिद्द करने लगे। शिव जी के बार बार कहने पर भी जब उस बालक ने अंदर नहीं जाने दिया तो शिव जी ने क्रोध में आकर बालक का सिर धड़ से अलग कर दिया। शिव जी के अंदर प्रवेश करने पर माता पार्वती ने उस बालक के बारे में प्रश्न किया तो शिवजी ने बताया कि उसके प्राण मेने हर लिए है। माता पार्वती ने क्रोध में आकर कहा कि यदि उनका बालक जीवित नहीं हुआ तो वो पूरी सृष्टि का विनाश कर देंगी। तब शिव जी के निर्देशानुसार विष्णु जी उत्तर दिशा में गए और गज का धड़ ले आये। मृत्युंजयरुद्र ने बालक पर गज का धड़ रखकर उसे पुनर्जीवित कर दिया। माता पार्वती के यह चिंता व्यक्त करने पर कि इस गजमुख के बारे में लोग कैसी -कैसी बातें करेंगे तो सभी देवताओ ने मिल कर उन्हें अग्रणीय पूजनीय देव होने का आशीर्वाद दिया और तभी से हर अवसर पर किसी भी देवी – देवता के पूजन से पहले गणपति जी की आराधना की जाती है।
श्री गणेश के कई नाम है — जिनमे गणपति ,गजानन , सिद्धि विनायक ,विध्नहर्ता , मंगल मूर्ति , भूपति आदि नामो से पुकारा जाता है। गणेश चतुर्थी के आरभ से कई दिन पूर्व ही इसकी तैयारियां प्रारम्भ हो जाती है। श्रद्धालु अपने घर पर पूरे नौ दिन पूर्ण आस्था के साथ गणपति जी की प्रतिमा स्थापित करते है और पूरे विधि विधान के साथ पूजा अर्चना करते है और दसवे दिन गाजे – बाजे के साथ गणपति जी को विदा किया जाता है और सर्व मंगल की प्रार्थना के साथ अगले वर्ष जल्दी से आने की कामना की जाती है।
