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50 Mirza Galib Shayari in Hindi :
मिर्ज़ा ग़ालिब की बेहतरीन शायरी हिंदी में
शायरी का जब भी जिक्र होता है तो एक नाम हमेशा जुबां पर आता है …. मिर्ज़ा ग़ालिब , जिनका पूरा नाम मिर्ज़ा असद-उल्लाह बेग ख़ां है | उर्दू भाषा के इस महान शायर ने फ़ारसी कविता के प्रवाह को हिन्दुस्तानी जुबान पर लाकर रख दिया था |
ग़ालिब को भारत और पाकिस्तान में एक महत्वपूर्ण कवि के रूप में जाना जाता है। उन्हे दबीर-उल-मुल्क और नज़्म-उद-दौला का खिताब मिला। इस लेख में हम मिर्ज़ा ग़ालिब की कुछ बेहतरीन शायरी का लुत्फ़ उठाएंगे |
50 + Mirza Galib Shayari in Hindi : मिर्ज़ा ग़ालिब की बेहतरीन शायरी हिंदी में
बादशाह सिर्फ वक़्त होता है
इंसान तो यूँ ही गुरूर करता है |
कुछ इस तरह से ज़िन्दगी को आसान कर दिया
किसी से माफ़ी ली और किसी को माफ़ कर दिया |
ख्वाहिशो का काफिला भी अजीब ही है “ग़ालिब ”
अक्सर वही से गुजरता है , जहाँ रास्ता दिखाई नहीं देता |
हाथो की लकीरों पर मत जा ऐ ग़ालिब
नसीब उनके भी होते है , जिनके हाथ नहीं होते |
बेवजह नहीं रोता कोई इश्क में ग़ालिब
जिसे खुद से बढकर चाहो वो रुलाता ज़रूर है |
हज़ारो ख्वाहिशे ऐसी कि
हर ख्वाहिश पर दम निकले ,
बहुत निकले मेरे अरमान
लेकिन फिर भी कम निकले |
अब किस किस सितम की मिसाल दू तुमको
तुम तो हर सितम ही बेमिसाल करते हो |
जब लगा था तीर तब इतना दर्द न हुआ “ग़ालिब ”
ज़ख्म का एहसास तब हुआ
जब कमान देखी अपने हाथो में |
रहने दे मुझे इन अंधेरो में ग़ालिब
कम्बखत रौशनी में अपनों के असली चेहरे नजर आते है |
वो आये घर में हमारे
खुदा की कुदरत है ,
हम कभी उनको तो
कभी अपने घर को देखते है |
हमको मालूम है ज़न्नत की हकीकत लेकिन
दिल के खुश रखने को “ग़ालिब ” ये ख्याल अच्छा है |
इश्क ने ग़ालिब को निकम्मा कर दिया
वर्ना हम भी आदमी थे काम के |
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है ,
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है |
इश्क़ पर जोर नहीं है ये वो
आतिश ‘ग़ालिब’कि लगाये न लगे और बुझाये न बुझे।
दिल से तेरी निगाह जिगर तक उतर गई
दोनों को इक अदा में रज़ामंद कर गई |
कितना ख़ौफ होता है शाम के अंधेरों में
पूछ उन परिंदों से जिनके घर नहीं होते |
दर्द जब दिल में हो तो दवा कीजिए
दिल ही जब दर्द हो तो क्या कीजिए |
न शोले में ये करिश्मा न बर्क़ में ये अदा
कोई बताओ कि वो शोखे-तुंदख़ू क्या है |
तुम न आए तो क्या सहर न हुईहाँ मगर चैन से बसर न हुई।
मेरा नाला सुना ज़माने नेएक तुम हो जिसे ख़बर न हुई।।
इस सादगी पे कौन न मर ऐ खुदा ,
लड़ते है और हाथ में तलवार भी नहीं है |
उस पे आती है मोहब्बत ऐसे ,
झूठ पे जैसे यकीन आ जाता है |
‘ग़ालिब’ बुरा न मान जो वाइ’ज़ बुरा कहे
ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे |
मोहब्बत में उनकी अना का पास रखते हैं,
हम जानकर अक्सर उन्हें नाराज़ रखते हैं |
अर्ज़-ए-नियाज़-ए-इश्क़ के क़ाबिल नहीं रहा
जिस दिल पे नाज़ था मुझे वो दिल नहीं रहा |
क़ासिद के आते आते ख़त इक और लिख रखूँ,
मैं जानता हूँ जो वो लिखेंगे जवाब में |
कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर-ए-नीम-कश को ,
ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता |
तुम अपने शिकवे की बातें
न खोद खोद के पूछो
हज़र करो मिरे दिल से
कि उस में आग दबी है |
वो रास्ते जिन पे कोई सिलवट ना पड़ सकी,
उन रास्तों को मोड़ के सिरहाने रख लिया |
अफ़साना आधा छोड़ के सिरहाने रख लिया,
ख़्वाहिश का वर्क़ मोड़ के सिरहाने रख लिया |
तमीज़-ए-ज़िश्ती-ओ-नेकी में लाख बातें हैं,
ब-अक्स-ए-आइना यक-फ़र्द-ए-सादा रखते हैं |
रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज,
मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं |
हम हैं मुश्ताक़ और वो बे-ज़ार
या इलाही ये माजरा क्या है
जान तुम पर निसार करता हूँ,
मैं नहीं जानता दुआ क्या है ?
इक शौक़ बड़ाई का अगर हद से गुज़र जाए
फिर ‘मैं’ के सिवा कुछ भी दिखाई नहीं देता |
ज़िन्दग़ी में तो सभी प्यार किया करते हैं,
मैं तो मर कर भी मेरी जान तुझे चाहूँगा |
हम जो सबका दिल रखते हैं
सुनो, हम भी एक दिल रखते हैं |
खुद को मनवाने का मुझको भी हुनर आता है
मैं वह कतरा हूं समंदर मेरे घर आता है |
यादे-जानाँ भी अजब रूह-फ़ज़ा आती है,
साँस लेता हूँ तो जन्नत की हवा आती है |
है और तो कोई सबब उसकी मोहब्बत का नहीं,
बात इतनी है के वो मुझसे जफ़ा करता है |
कुछ तो तन्हाई की रातों में सहारा होता,
तुम न होते न सही ज़िक्र तुम्हारा होता |
गुज़रे हुए लम्हों को मैं इक बार तो जी लूँ,
कुछ ख्वाब तेरी याद दिलाने के लिए हैं |
तुम सलामत रहो हज़ार बरस,
हर बरस के हों दिन पचास हज़ार |
मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तेरे पीछे,
तू देख कि क्या रंग है तेरा मिरे आगे |
फिर मुझे दीदा-ए-तर याद आया
दिल जिगर तश्ना ए फरियाद आया
दम लिया था ना कयामत ने हनोज़
फिर तेरा वक्ते सफ़र याद आया |
जान दी दी हुई उसी की थी
हक़ तो ये है कि हक़ अदा न हुआ |
मैं बुलाता तो हूँ उस को मगर ऐ जज़्बा-ए-दिल
उस पे बन जाए कुछ ऐसी कि बिन आए न बने |
इश्क़ मुझ को नहीं वहशत ही सही
मेरी वहशत तेरी शोहरत ही सही |
इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब’
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने |
इनकार की सी लज़्ज़त इक़रार में कहाँ,
होता है इश्क़ ग़ालिब उनकी नहीं नहीं से |
मगर लिखवाए कोई उस को खत
तो हम से लिखवाए
हुई सुबह और घर से
कान पर रख कर कलम निकले |
मोहब्बत में नही फर्क जीने और मरने का
उसी को देखकर जीते है जिस ‘काफ़िर’ पे दम निकले |
मरते है आरज़ू में मरने की
मौत आती है पर नही आती,
काबा किस मुँह से जाओगे ‘ग़ालिब’
शर्म तुमको मगर नही आती ।
ग़ालिब ने यह कह कर तोड़ दी तस्बीह.
गिनकर क्यों नाम लू उसका जो बेहिसाब देता है।
कहाँ मयखाने का दरवाज़ा ‘ग़ालिब’ और कहाँ वाइज
पर इतना जानते है कल वो जाता था के हम निकले |
बना कर फकीरों का हम भेस ग़ालिब
तमाशा-ए-अहल-ए-करम देखते है |
हुई मुद्दत कि ‘ग़ालिब’मर गया पर याद आता है,
वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता |
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