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Battle of Saragarhi
सारागढ़ी का युद्ध 12 सितम्बर 1897 को ब्रिटिश भारतीय सेना और अफगानिस्तान सेना के बीच हुआ | 1897 के साल तक अंग्रेजों का दबदबा पूरी तरह बढता ही जा रहा था. पुरे भारतवर्ष पर कब्ज़ा करने के बाद ब्रिटिश सेना अफगानिस्तान पर कब्ज़ा करना चाहती थी | उन्होंने अफगानिस्तान पर हमले करने भी शुरू कर दिए थे | अफगानिस्तान सीमा पर ब्रिटिश सेना के कब्ज़े में दो किले गुलिस्तान का किला और लॉकहार्ट का किला थे. ऐसा कहा जाता हैं कि ओराक्ज़ई जनजाति के अफगान उस समय के गुलिस्तान और लॉकहार्ट के किलों पर अपना कब्ज़ा करना चाहते थे. इन दोनों की किलों के पास सारागढ़ी की एक चौकी हुआ करती थी| यह चौकी संचार की दृष्टि से बेहद ही महत्वपूर्ण थी|यही से ही आस पास के इलाकों में संपर्क किया जाता था| इस चौकी की सुरक्षा की जिम्मेदारी 36वी सिक्ख रेजिमेंट को सौपी गयी थी.
इस युद्ध की शुरुआत 12 सितम्बर 1897 की सुबह 9 बजे हुई , जब लगभग 10,000 अफगान पश्तूनों की सेना सारागढ़ी पोस्ट पर चढाई करने के लिए संकेंत देती हैं. करीब 10 हजार अफ़गानी सैनिक उनकी ओर तेजी से बढ़ते जा रहे थे. दुश्मन की इतनी बड़ी संख्या देखकर सब हैरान थे. गुरमुख सिंह पोस्ट की सुरक्षा के लिए कर्नल हौथटन को एक तार करते हैं कि उनपर हमला होने वाला हैं उन्हें मदद की आश्यकता हैं. कर्नल हौथटन के अनुसार वह सारागढ़ी में तुरन्त सहायता नहीं भेज सकते थे. यह जानकारी आने के बाद 21 सिक्खों का नेतृत्व कर रहे ईशर सिंह निर्णय लेते हैं कि वह मृत्यु प्राप्त करने तक इस चौकी को नहीं छोड़ेंगे. ईशर सिंह का साथ उनके सैनिकों ने भी दिया और अन्तिम साँस तक लड़ने का निर्णय लिया. सारे सिक्ख सैनिक अपनी-अपनी बंदूकें लेकर किले के ऊपरी हिस्से पर खड़े हो गए थे. अफगानी निरंतर आगे बढते ही जा रहे थे| चारो और सन्नाटा पसर गया था. युद्ध के मैदान में केवल घोड़ों की आवाज़ सुनाई दे रही थी|
पहली गोली चलने के साथ ही सारागढ़ी का युद्ध चालू हो गया| दोनों और से गोलियों की आवाज आने लग गयी. अंधाधुंध गोलीबारी के बीच अफगानी नेता पश्तों समझ गया कि यह जंग आसान नहीं होने वाली हैं| युद्ध के दौरान कई बार अफगान सेना के अधिनायक ने सैनिकों को आत्मसमर्पण के लिए लुभाया, लेकिन कोई भी सैनिक इसके लिए तैयार नहीं था| अंतः 10 हजार अफगान लड़ाके चौकी पर हमला कर देते हैं| बंदूकों से जंग नहीं जीतता देख अफगान किले के दरवाजे तोडना शुरू देते हैं लेकिन उन्हें इसमें भी सफलता नहीं मिलती हैं. लेकिन अचानक किले की एक दीवार ढह जाती हैं और अफगान किले में घुस जाते हैं |अचानक से गोलियों से चलने वाली लड़ाई चाकू और तलवार में बदल जाती हैं.
इस युद्ध में 20 सिक्खों से सीधे तौर पर अफगानों से लड़ाई कर रहे थे. 1 सिक्ख गुरमुख सिंह युद्ध की सारी जानकारी कर्नल हौथटन को तार के माध्यम से भेज रहे थे| आखिरकार वही हुआ जिसका सबको अंदाज़ा था दुश्मन से लड़ते लड़ते 21 में से 20 सिक्ख शहीद हो गए|अंतिम रक्षक गुरमुख सिंह को अफगानों ने आग के गोलों से मारा| गुरमुख सिंह अपने अतिम क्षण तक “बोले सो निहाल, सत श्री अकाल” बोलते रहे|
सारागढ़ी के इस युद्ध में 21 सिक्खों ने अफगानों के 600 लोगों को मार गिराया. हालाँकि इस लड़ाई में 36 वी रेजिमेंट के सभी 21 सिख शहीद हो गए. लेकिन 21 सिक्खों ने ओराक्ज़ई जनजातियों के अफगानों को पुरे 1 दिन तक परेशान रखा| सारागढ़ी को तबाह करने के पश्चात अफ़्ग़ानों ने गुलिस्तां किले पर निगाहें डाली लेकिन इन सब में बहुत देरी हो चुकी थी और 13 सितम्बर की मध्यरात्रि अतिरिक्त सेना किले की सुरक्षा के लिए पहुँच गयी. और मात्र 2 दिन के भीतर सारागढ़ी पर वापस भारतीय ब्रिटिश सेना का कब्ज़ा हो गया| इसके बाद पश्तों ने स्वीकार किया कि 21 सिक्खों के साथ युद्ध में उनके 600 सैनिक मारे गये. और कई घायल हो गए थे| सारागढ़ी के युद्ध मे शहीद हुए सिक्खों की बहादुरी का सम्मान करने के लिए तीन गुरुद्वारों का निर्माण किया गया| एक गुरुद्वारे का निर्माण वही किया गया हैं जहाँ पर इस लड़ाई को लड़ा गया था. दूसरा फिरोजपुर में और तीसरे का निर्माण अमृतसर में किया गया हैं| अमृतसर में स्थित गुरूद्वारे का नाम गुरुद्वारा सारागढ़ी हैं. यह स्मृति प्रतीक 14 फ़रवरी 1902 को बनकर तैयार हुआ था| गुरुद्वारा सारागढ़ी में सभी शहीदों को नाम सुनहरे शब्दों से लिखे गए हैं|
