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BEST 5 stories of Akbar and Birbal
बादशाह अकबर के नवरत्नों में से अनमोल रत्न बीरबल को माना जाता है | बीरबल की बुद्धिमत्ता , सूझवान व्यक्तित्व एवम चतुरता का हर कोई कातिल है | अकबर बीरबल की कहानियां न केवल रोचक होती है , बल्कि मानसिक रूप से मजबूत बनाने के लिए भी काफी अच्छी होती है |
BEST 5 stories of Akbar and Birbal
मूर्ख लोगो की सूचि
एक वक्त की बात है, बादशाह अकबर अपने दरबारियों के साथ दरबार में मौजूद थे। तभी उनके मन में एक बात आती है। बादशाह बोलते हैं कि मेरे आसपास हमेशा बुद्धिमान लोग रहते हैं और मैं उनके बीच रहकर बोर हो गया हूं। मैंने फैसला किया है कि मुझे कुछ मूर्ख व्यक्तियों से मिलना चाहिए। अकबर, बीरबल से कहते हैं, ‘तुमने हमेशा हमारी मदद अपने ज्ञान और चतुराई से की है। हम चाहते हैं कि इस बार भी तुम ऐसा ही कुछ करो और हमारे लिए 6 मूर्ख व्यक्ति ढूंढ कर लेकर आओ।’
बीरबल : जी जहांपनाह, मैं आपके लिए 6 मुर्ख व्यक्ति जरूर ढूंढकर लाऊंगा।
अकबर : हम आपको 6 मूर्ख व्यक्ति ढूंढने के लिए 30 दिन का समय देते हैं।
बीरबल : जहांपनाह, मुझे इतने अधिक समय की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
अकबर : ठीक है, अगर तुम उससे पहले ही मूर्ख व्यक्ति ले आ सकते हो, तो यह अच्छी बात है।
इसके बाद बीरबल मूर्ख व्यक्तियों की तलाश में निकल पड़ता है। बीरबल रास्ते में पूरा समय इसी सोच में था कि उसे वो मूर्ख लोग कहां मिलेंगे। तभी उसे गधे पर बैठा एक आदमी दिखाई देता है, जो सिर पर घास की गठरी रखे हुए था। बीरबल ने तुरंत घोड़ा रोका और उससे उसकी पहचान पूछने लगा।
बीरबल : कौन हो तुम और ऐसे गधे पर बैठकर और घास अपने सिर पर लेकर क्यों जा रहे हो?
व्यक्ति : मैं रामू हूं और मेरा गधा कमजोर व थका हुआ है, इसलिए गधे का बोझ कम करने के लिए मैंने घास की गठरी अपने सिर पर रखी है।
यह सुनकर बीरबल सोचता है कि मुझे पहला मूर्ख व्यक्ति मिल गया। फिर बीरबल उससे कहता है कि तुम जानवरों के बारे में इतना सोचते हो, इसलिए मैं तुम्हें बादशाह अकबर से इनाम दिलवाऊंगा। यह कहकर बीरबल उस व्यक्ति को अपने साथ चलने के लिए कहता है। इनाम की बात सुनकर रामू बीरबल के साथ हो लेता है।
बीरबल और रामू कुछ दूर चले ही थे कि बीरबल को दो व्यक्ति आपस में लड़ाई करते हुए दिखाई दिए। बीरबल उन दोनों व्यक्तियों को लड़ने से रोकता है और उनसे पूछता है कि तुम दोनों कौन हो और किस बात के लिए लड़ रहे हो?
पहला व्यक्ति : जनाब मेरा नाम चंगु है।
दूसरा व्यक्ति : और मेरा मंगू है।
मंगू : जनाब, मुझे चंगु कहता है कि इसके पास शेर है, जिसे वो मेरी गाय के शिकार के लिए छोड़ेगा।
चंगु : हां मैं ऐसा ही करूंगा और मुझे बहुत मजा भी आने वाला है।
बीरबल : कहां है तुम लोगों की गाय और शेर?
मंगू : जनाब जब भगवान हमें वरदान देने आएंगे, तो मैं उनसे गाय मांगूंगा और चंगु शेर मांगेगा,
जिसे यह मेरी गाय पर छोड़ने की बात कर रहा है।
बीरबल: अच्छा यह बात है।
उनकी बातें सुनकर बीरबल समझ गया कि उन्हें दो और मूर्ख व्यक्ति मिल गए हैं। बीरबल इनाम की बात कहकर उन्हें भी अपने साथ ले लेता है। उन तीनों को लेकर बीरबल अपने घर पहुंचता है और फिर सोचने लगता है कि बाकी के मूर्ख व्यक्ति कहा से ढूंढकर लाऊं। बीरबल उन तीनों मूर्खों को अपने घर में ही रहने के लिए कहकर बाहर चला जाता है। जब बीरबल और मूर्ख लोगों को ढूंढने के लिए बाहर आता है, तो उसे एक व्यक्ति दिखाई देता है, जो कुछ ढूंढता रहता है। बीरबल उसके पास जाकर पूछता है कि आप क्या ढूंढ रहे हैं?
व्यक्ति : जनाब मेरी अंगूठी कहीं गिर गई है, जिसे मैं काफी समय से खोज रहा हूं, लेकिन मुझे नहीं मिल रही है।
बीरबल : क्या आपको पता है कि अंगूठी कहां गिरी थी?
व्यक्ति : दरअसल, मेरी अंगूठी यहां से दूर उस पेड़ के पास गिरी थी, लेकिन वहां अंधेरा होने के कारण मैं यहां उसे ढूंढ रहा हूं।
बीरबल : अच्छा यह बात है। आप कल हमारे साथ बादशाह के दरबार में चलो। मैं बादशाह अकबर से आपको दूसरी अंगूठी देने के लिए कहूंगा।
व्यक्ति : अच्छा ठीक है फिर (खुश होकर)।
अगले दिन सुबह बीरबल दरबार में उन चारों मूर्खों को लेकर पहुंचता है।
बीरबल : बादशाह अकबर मैं आपके कहे अनुसार मूर्ख व्यक्तियों को ढूंढ कर ले आया हूं।
अकबर : बीरबल तुमने तो एक ही दिन में मूर्ख व्यक्ति ढूंढ लिए, क्या हमारे राज्य में मूर्खों की संख्या अधिक है और तुम यकीन के साथ कैसे कह सकते हो कि ये व्यक्ति मूर्ख हैं?
बीरबल ने बादशाह से सारी बातें बताई। फिर अकबर कहते हैं कि ये तो केवल चार ही लोग हैं, बाकी के दो मूर्ख कहां हैं?
बीरबल : जहांपनाह यहां पर 6 मूर्ख व्यक्ति हैं?
अकबर : यहां कहां हैं और कौन हैं, हमें भी बताओ।
बीरबल : जहांपनाह, एक तो मैं स्वयं हूं।
अकबर : तुम मूर्ख कैसे हुए?
बीरबल : मैं इसलिए मूर्ख हूं, क्योंकि मैं इन मूर्खों को खोजकर लाया।
अकबर : फिर अकबर हंसने लगता है और कहता है कि मैं समझ गया कि दूसरा मूर्ख कौन है। पर मैं तुमसे सुनना चाहता हूं।
बीरबल: दूसरे आप हैं जहांपनाह, जो आपने मुझे मूर्ख व्यक्तियों को लाने के लिए कहा।
बीरबल की बातें सुनकर अकबर उसकी प्रशंसा करने लगते हैं और कहते हैं कि बीरबल के पास हर सवाल का जवाब होता है।
शिक्षा :
दिमाग और चतुराई से हर मुश्किल काम आसान हो सकता है, लेकिन ऐसे कामों में अपना कीमती समय व्यर्थ नहीं करना चाहिए, जिसका कोई मतलब न हो।
2. सबकी सोच एक जैसी
दरबार की कार्यवाही चल रही थी। सभी दरबारी एक ऐसे प्रश्न पर विचार कर रहे थे जो राज-काज चलाने की दृष्टि से बेहद अहम न था। सभी एक-एक कर अपनी राय दे रहे थे।
बादशाह दरबार में बैठे यह महसूस कर रहे थे कि सबकी राय अलग है। उन्हें आश्चर्य हुआ कि सभी एक जैसे क्यों नहीं सोचते!
तब बादशाह अकबर ने बीरबल से पूछा, ‘क्या तुम बता सकते हो कि लोगों की राय आपस में मिलती क्यों नहीं? सब अलग-अलग क्यों सोचते हैं?’
‘हमेशा ऐसा नहीं होता, बादशाह सलामत!’ बीरबल बोला, ‘कुछ समस्याएं ऐसी होती हैं जिन पर सभी के विचार समान होते हैं।’ इसके बाद कुछ और काम निपटा कर दरबार की कार्यवाही समाप्त हो गई। सभी अपने-अपने घरों को लौट चले।
उसी शाम जब बीरबल और बादशाह अकबर बाग में टहल रहे थे, तो बादशाह ने फिर वही राग छेड़ दिया और बीरबल से बहस करने लगे।
तब बीरबल बाग के ही एक कोने की ओर उंगली से संकेत करता हुआ बोला, ‘वहां उस पेड़ के निकट एक कुंआ है। वहां चलिए, मैं कोशिश करता हूं कि आपको समझा सकूं कि जब कोई समस्या जनता से जुड़ी हो तो सभी एक जैसा ही सोचते हैं।
मेरे कहने का मतलब यह है कि बहुत-सी ऐसी बातें हैं जिनको लेकर लोगों के विचार एक जैसे होते हैं।’
बादशाह अकबर ने कुछ देर कुंए की ओर घूरा, फिर बोले, ‘लेकिन मैं कुछ समझा नहीं, तुम्हारे समझाने का ढंग कुछ अजीब-सा है।’ बादशाह जबकि जानते थे कि बीरबल अपनी बात सिद्ध करने के लिए ऐसे ही प्रयोग करता रहता है।
‘सब समझ जाएंगे हुजूर!’ बीरबल बोला, ‘आप शाही फरमान जारी कराएं कि नगर के हर घर से एक लोटा दूध लाकर बाग में स्थित इस कुंए में डाला जाए। दिन पूर्णमासी का होगा। हमारा नगर बहुत बड़ा है, यदि हर घर से एक लोटा दूध इस कुएं में पड़ेगा तो यह दूध से भर जाएगा।’
बीरबल की यह बात सुन बादशाह अकबर ठहाका लगाकर हंस पड़े। फिर भी उन्होंने बीरबल के कहेनुसार फरमान जारी कर दिया।
शहर भर में मुनादी करवा दी गई कि आने वाली पूर्णमासी के दिन हर घर से एक लोटा दूध लाकर शाही बाग के कुंए में डाला जाए। जो ऐसा नहीं करेगा उसे सजा मिलेगी। पूर्णमासी के दिन बाग के बाहर लोगों की कतार लग गई। इस बात का विशेष ध्यान रखा जा रहा था कि हर घर से कोई न कोई वहां जरूर आए। सभी के हाथों में भरे हुए पात्र (बरतन) दिखाई दे रहे थे। बादशाह अकबर और बीरबल दूर बैठे यह सब देख रहे थे और एक-दूसरे को देख मुस्करा रहे थे। सांझ ढलने से पहले कुंए में दूध डालने का काम पूरा हो गया। हर घर से दूध लाकर कुंए में डाला गया था।
जब सभी वहां से चले गए तो बादशाह अकबर व बीरबल ने कुंए के निकट जाकर अंदर झांका। कुंआ मुंडेर तक भरा हुआ था। लेकिन यह देख बादशाह अकबर को बेहद हैरानी हुई कि कुंए में दूध नहीं पानी भरा हुआ था। दूध का तो कहीं नामोनिशान तक न था।
हैरानी भरी निगाहों से बादशाह अकबर ने बीरबल की ओर देखते हुए पूछा, ‘ऐसा क्यों हुआ? शाही फरमान तो कुंए में दूध डालने का जारी हुआ था, यह पानी कहां से आया? लोगों ने दूध क्यों नहीं डाला?’
बीरबल एक जोरदार ठहाका लगाता हुआ बोला, ‘यही तो मैं सिद्ध करना चाहता था हुजूर! मैंने कहा था आपसे कि बहुत-सी ऐसी बातें होती हैं जिस पर लोग एक जैसा सोचते हैं, और यह भी एक ऐसा ही मौका था। लोग कीमती दूध बरबाद करने को तैयार न थे। वे जानते थे कि कुंए में दूध डालना व्यर्थ है। इससे उन्हें कुछ मिलने वाला नहीं था।
इसलिए यह सोचकर कि किसी को क्या पता चलेगा, सभी पानी से भरे बरतन ले आए और कुंए में उड़ेल दिए। नतीजा…दूध के बजाय पानी से भर गया कुंआ।’ बीरबल की यह चतुराई देख बादशाह अकबर ने उसकी पीठ थपथपाई। बीरबल ने सिद्ध कर दिखाया था कि कभी-कभी लोग एक जैसा भी सोचते हैं।
3. इश्वर जो करता है , भले के लिए ही करता है
इश्वर जो करता है भले के लिए करता है
बीरबल एक ईमानदार तथा धर्म-प्रिय व्यक्ति था। वह प्रतिदिन ईश्वर की आराधना बिना नागा किया करता था। इससे उसे नैतिक व मानसिक बल प्राप्त होता था। वह अक्सर कहा करता था कि ईश्वर जो कुछ भी करता है मनुष्य के भले के लिए ही करता है। कभी-कभी हमें ऐसा लगता है कि ईश्वर हम पर कृपा दृष्टि नहीं रखता, लेकिन ऐसा होता नहीं। कभी-कभी तो उसके वरदान को भी लोग शाप समझने की भूल कर बैठते हैं। वह हमको थोड़ी पीड़ा इसलिए देता है ताकि बड़ी पीड़ा से बच सकें। एक दरबारी को बीरबल की ऐसी बातें पसंद न आती थीं। एक दिन वही दरबारी दरबार में बीरबल को संबोधित करता हुआ बोला- देखो, ईश्वर ने मेरे साथ क्या किया- कल शाम को जब मैं जानवरों के लिए चारा काट रहा था तो अचानक मेरी छोटी उंगली कट गई। क्या अब भी तुम यही कहोगे कि ईश्वर ने मेरे लिए यह अच्छा किया है? कुछ देर चुप रहने के बाद बोला बीरबल- मेरा अब भी यही विश्वास है क्योंकि ईश्वर जो कुछ भी करता है मनुष्य के भले के लिए ही करता है। सुनकर वह दरबारी नाराज हो गया और बोला मेरी तो उंगली कट गई और बीरबल को इसमें भी अच्छाई नजर आ रही है। मेरी पीड़ा तो जैसे कुछ भी नहीं। कुछ अन्य दरबारियों ने भी उसके सुर में सुर मिलाया। तभी बीच में हस्तक्षेप करते हुए बादशाह अकबर बोले, बीरबल हम भी अल्लाह पर भरोसा रखते हैं, लेकिन यहां तुम्हारी बात से सहमत नहीं। इस दरबारी के मामले में ऐसी कोई बात नहीं दिखाई देती जिसके लिए उसकी तारीफ की जाए। बीरबल मुस्कराता हुआ बोला- ठीक है जहांपनाह, समय ही बताएगा अब। तीन महीने बीत चुके थे। वह दरबारी, जिसकी उंगली कट गई थी, घने जंगल में शिकार खेलने निकला हुआ था। एक हिरण का पीछा करते वह भटक कर आदिवासियों के हाथों में जा पड़ा। वे आदिवासी अपने देवता को प्रसन्न करने के लिए मानव बलि में विश्वास रखते थे। अतः वे उस दरबारी को पकड़ कर मंदिर में ले गए, बलि चढ़ाने के लिए। लेकिन जब पुजारी ने उसके शरीर का निरीक्षण किया तो हाथ की एक उंगली कम पाई। नहीं, इस आदमी की बलि नहीं दी जा सकती। मंदिर का पुजारी बोला – यदि नौ उंगलियों वाले इस आदमी को बलि चढ़ा दिया गया तो हमारे देवता बजाए प्रसन्न होने के क्रोधित हो जाएंगे, अधूरी बलि उन्हें पसंद नहीं। हमें महामारियों, बाढ़ या सूखे का प्रकोप झेलना पड़ सकता है। इसलिए इसे छोड़ देना ही ठीक होगा और उस दरबारी को मुक्त कर दिया गया। अगले दिन वह दरबारी दरबार में बीरबल के पास आकर रोने लगा। तभी बादशाह भी दरबार में आ पहुंचे और उस दरबारी को बीरबल के सामने रोता देखकर हैरान रह गए। तुम्हें क्या हुआ, रो क्यों रहे हो? -बादशाह अकबर ने सवाल किया। जवाब में उस दरबारी ने अपनी आपबीती विस्तार से कह सुनाई। वह बोला- अब मुझे विश्वास हो गया है कि ईश्वर जो कुछ भी करता है, मनुष्य के भले के लिए ही करता है। यदि मेरी उंगली न कटी होती तो निश्चित ही आदिवासी मेरी बलि चढ़ा देते। इसीलिए मैं रो रहा हूं, लेकिन ये आंसू खुशी के हैं। मैं खुश हूं क्योंकि मैं जिंदा हूं। बीरबल के ईश्वर पर विश्वास को संदेह की दृष्टि से देखना मेरी भूल थी। बादशाह अकबर ने मंद-मंद मुस्कराते हुए दरबारियों की ओर देखा, जो सिर झुकाए चुपचाप खड़े थे। बादशाह अकबर को गर्व महसूस हो रहा था कि बीरबल जैसा बुद्धिमान उसके दरबारियों में से एक है।
4. स्वर्ग की यात्रा
एक दिन शहंशाह अकबर नाई से अपनी हजामत बनबा रहे थे। तभी वह नाइ शहंशाह अकबर की तारीफ करने लगता है – नाई – जहाँ पनाह आप अपनी सल्तनत में सबका ख्याल रखते हैं बच्चे, बड़े, गरीब, लाचार आदि सबका। अकबर – शुक्रिया! नाई – लेकिन, जहाँ पनाह! अकबर – लेकिन, लेकिन क्या, क्या हम किसी को भूल रहे हैं, जिसकी हम देख भाल नही करते हैं? नाई – जहाँ पनाह गुस्ताखी माफ करें, क्या कभी आपने बड़े-बूढों यानी कभी अपने पूर्वजों के बारे में सोचा है, जो दुनिया छोड़ कर स्वर्ग चले गए हैं। अकबर – लेकिन हम तो उनका भी ख्याल रखते हैं, उनके हक में हम दुआ करते हैं, उनकी याद में हमने शाही मकबरे बनवाये है। नाई – लेकिन जहाँ पनाह कभी आपने किसी को स्वर्ग भेजा है, अपने पूर्वजों की खबर लेने के लिए, उन्हें किसी चीज़ की वहाँ ज़रूरत तो नही है। अकबर – क्या, ये क्या कह रहे हो, कोई स्वर्ग जाकर बापस कैसे आ सकता है, तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या। कोई स्वर्ग की यात्रा करके बापस कैसे आ सकता है। नाई – जहाँ पनाह मैं सच कह रहा हूँ, स्वर्ग की यात्रा करके बापस आ सकता है, मैं एक ऐसे योगी बाबा को जानता हूँ, जो स्वर्ग भेज कर बापस बुला सकते हैं। बजीर अब्दुल्ला उनके भक्त हैं। आप चाहे तो बज़ीर अब्दुल्ला से कहे कर आप उस योगी को बुला सकते हैं। अकबर – ठीक है तुम कल ही बज़ीर अब्दुल्ला से कह कर उस योगी को बुलाओ। फिर अगले दिन बज़ीर अब्दुल्ला उस योगी बाबा को लेकर आते हैं। अकबर – बज़ीर अब्दुल्ला क्या योगी बाबा दरबार में आ गए हैं। बज़ीर अब्दुल्ला – जी! जहाँ पनाह वो दरबार के बाहर ही खड़े हैं। आपकी इज़ाज़त हो तो उन्हें बुलाया जाए। अकबर – जी बज़ीर अब्दुल्ला उन्हें बुलाया जाए। योगीराज निरंजन बाबा दरबार मे हाज़िर होते हैं। योगीराज – अलख निरंजन, मेरा नाम योगी निरंजन बाबा है। अकबर – हमने सुना है योगी जी आप किसी को भी स्वर्ग भेज कर बापस बुला सकते हैं ये बात सच हैं। योगीराज – हाँ मैं किसी को भी स्वर्ग भेज कर बापस बुला सकता हूँ। अकबर – हमें भी अपने पूर्वजों के बारे में जानकारी चाहिये, वह स्वर्ग में कैसे रह रहे हैं, उन्हें वहाँ किसी चीज़ की ज़रूरत तो नही है। योगीराज – आप किसी भरोसे मन्द इंसान को स्वर्ग भेज सकते हैं, जो स्वर्ग के मोह में न फस कर बापस आ सके। बज़ीर अब्दुल्ला – जहाँ पनाह आप बीरबल को इस काम के लिए भेज दीजिए, बीरबल से ज़्यादा भरोसेमंद और कौन हो सकता है। अकबर – बीरबल क्या आप हमारे लिए स्वर्ग जाएंगे। बीरबल – जी! जहाँ पनाह मैं स्वर्ग जरूर जाऊंगा। लेकिन उससे पहले मैं निरंजन बाबा से कुछ पूछना चाहता हूँ। योगी राज़ इस यात्रा में कितना समय लगेगा। योगीराज – इस यात्रा में कम से कम दो महीने लगेंगे अगर तुम स्वर्ग के सुख के मोह में न फसों तो। बीरबल – योगी जी आप मुझे स्वर्ग कैसे भेजेंगे। योगीराज – मैं एक पवित्र आग जलाऊंगा उसमे तुम्हे प्रबेश करना है, वैसे तो ये क्रिया कहीं भी हो सकती है, लेकिन हम इसे गंगा नदी के किनारे करेंगे। बीरबल – जहाँ पनाह मैं काफी दिनों के लिए अपने घर से दूर रहूंगा। इसलिए मैं चार पांच दिन की मोहलत मांगता हूं, कुछ अधूरे काम निपटाने है। अकबर – ठीक है बीरबल, योगीराज जी आप ये काम पांच दिन बाद सम्पन करें। अब पांच दिन बाद बीरबल को जलाने के लिए ले जाया जाता है। स्वर्ग की यात्रा के लिए योगीराज विधि सम्पन्न करते हैं। वह एक चिता पर फूल और कुछ सामिग्री डालते हैं और बीरबल के माथे पर तिलक करते हैं और चित्त हो जाने को कहते हैं। बीरबल – अलबिदा! जहाँ पनाह। अकबर – हमे आपकी बहुत याद आएगी आप जल्दी लौटने की कोशिश करना। बीरबल – जी जहाँ पनाह, मैं जल्दी लौट कर आऊंगा। और फिर दो महीने गुज़र जाते हैं, शहंशाह अकबर बहुत चिंतित हो जाते हैं। अकबर – हमे बीरबल की बहुत याद आ रही है, दो महीने गुज़र चुके पर बीरबल अभी तक नही लौटे, हमे बहुत चिंता हो रही है। योगीराज का क्या कहना है, कब तक बीरबल लौट आएंगे। बज़ीर अब्दुल्ला – जहाँ पनाह, योगी बाबा ये भी तो कह रहे थे हो सकता है बीरबल को स्वर्ग के सुख बहुत भा गए हों और वह उन्हें छोड़ कर न आना चाहें। अकबर – नही ऐसा कभी नही हो सकता है, बीरबल ऐसा कभी नही कर सकते हैं, उन पर हमें पूरा भरोसा है। उसी वक्त वहां पर बीरबल आते हैं। उनके लम्बे लम्बे बाल होते हैं। लम्बी सी दाड़ी अकबर उन्हें देख कर बहुत खुश होते हैं। अकबर – खुशामदीद! खुशामदीद! हमे आपको देख कर बहुत खुशी हुई और बताइए स्वर्ग में हमारे पूर्वज कैसे हैं, उन्हें किसी चीज की वहाँ जरूरत तो नही है। बीरबल – नही, जहाँ पनाह उन्हें किसी भी चीज़ की ज़रूरत नही है, वे वहां बहुत खुश हैं। अकबर – लेकिन बीरबल आपने ये बाल इतने क्यों बड़ा लिए हैं। बीरबल – जहाँ पनाह मेरे ही नही वहां पर सभी के बाल बहुत लंबे हैं। वहाँ पर कोई नाई नही है बाल काटने के लिए। इसलिए उन सभी ने यहाँ पर जो नाई है उसे बुलाने के लिए कहा है ताकि वो वहाँ सबके बाल काट सके । अकबर – हाँ, हाँ क्यूँ नही, हम अभी अपने नाई को वहाँ भेज रहे हैं। योगिराज़ और वह नाई अभी यहीं पर हैं, वो इस वक्त हमारे मेहमान बन कर रह रहे हैं। हम अभी स्वर्ग भेजने की क्रिया करबाते हैं, योगीराज और उस नाई को बुलाते हैं। वो दोनों दरबार मे हाज़िर होते हैं, अकबर उनसे कहते हैं- अकबर – योगीराज स्वर्ग में नाई की ज़रूरत है, आप जल्दी से इस नाई को स्वर्ग भेजने की क्रिया शुरू कीजिए। नाई – (अपने घुटनों पर गिर कर), जहाँ पनाह मुझे माफ़ कर दीजिए, मुझसे ये सब बज़ीर अब्दुल्ला ने करवाया था। क्योंकि वह बीरबल की शोहरत से जलते हैं और बीरबल को अपने रास्ते से हटाना चाहते थे और ये बाबा भी पाखंडी है। पता नही बीरबल उस आग से कैसे बच गए, लेकिन मैं नही बचूंगा, मुझे माफ़ कर दीजिये अकबर – क्या, इतनी बड़ी साजिश बीरबल के खिलाफ! सिपाहियों इस पाखंडी बाबा और इस नाई को ले जाओ और काल कोठरी में डाल दो। और तुम बज़ीर अब्दुल्ला मुझे तुम से ये उम्मीद नही थी। मैं अगर चाहूँ तो तुम्हे अभी फांसी पर लटका दूँ, लेकिन तुमने हमारी कई साल हिफाज़त की है, इसलिए हम तुम्हें इस देश से निकाल देते हैं। सिपाहियों इसे ले जाकर सरहद के बाहर छोड़ आओ और फिर कभी अपनी शक्ल मत दिखाना। अच्छा बीरबल मेरे बुद्धिमान दोस्त ये बताओ तुम्हे इस साजिश का कैसे पता लगा। बीरबल – जहाँ पनाह जब मैंने योगीराज के मुँह अगम प्रवेश करने वाली बात सुनी तो मुझे लगा दाल में कुछ काला है। तभी तो मैंने आपसे पांच दिन की मोहलत मांगी और मैंने उन पांच दिनों में एक ऐसी सुरंग तैयार करवाई जो उस जगह से सीधे मेरे घर को जाती है। जहाँ पनाह जब योगीराज ने आग जलाई तो मैं सीधे उस सुरंग पर खड़ा था, जो मेरे घर को जाती है, योगीराज के आग जलाते ही मैं सुरंग का दरबाजा खोल कर अपने घर पहुंच गया। जहाँ पनाह इस तरह से मैं वहां से बच निकला। और मैं चाहता था, ये लोग अपना गुनाह खुद कुबूल करें इसलिए मैंने दो महीने अपने बाल नही काटे, क्योंकि मैं ये भी जानता था कि इन तीनो में सबसे कमज़ोर कड़ी नाई है। अकबर – वाह! बीरबल वाह! एक तुम ही हो जो ऐसा कर सकते हो। तुम्हारे जैसा कोई नही! मेरे शातिर दोस्त तुम ही ऐसा कर सकते हो। वाह! बीरबल वाह! बीरबल – शुक्रिया! जहाँ पनाह शुक्रिया!
5. सुनहरे गेंहू की बाली
सुनहरे गेंहूँ की बाली
एक दिन की बात है जहाँ पनाह अकबर के दरबार मे सुबह-सुबह कोई सफाई कर रहा था। वो एक फूलदान की सफाई कर रहा था। फिर अचानक वह फूलदान उसके हाथ से फिसल जाता है और टूट जाता है। सेवक फूलदान टूटने से घबरा जाता है और कहता है या खुदा ये क्या हो गया ये तो जहाँ पनाह का सबसे पसंदीदा फूलदान था। अब जहाँ पनाह मुझे सजा देंगे और वह फूलदान के टूटे हुए टुकड़े समेट कर घबराता हुआ चला जाता है। तभी वहां जहाँ पनाह अकबर आते हैं और अपना फूलदान न पाकर परेशान होने लगते हैं और अपने सिपाही को बुलाते हैं और कहते हैं – अकबर – सिपाही यहाँ पर जो फूलदान रहा करता था वो कहाँ गया, कहीं वो फिर से तो कहीं नही खो गया। सिपाही – जब मैंने सेवक को सफाई करने के लिए भेजा था तब तो यहीं था, उस सेवक को ही पता होगा के फूल दान कहाँ गया? अकबर – जाओ उस सेवक को बुला कर लाओ और सिपाही सेवक को बुलाने चला जाता है। थोड़ी देर बाद सिपाही सेवक को बुलाकर लाता है। अकबर – सेवक यहाँ पर जो फूल दान रखा था वो कहाँ गया? सेवक बहुत घबरा जाता है और कहता है – सेवक – जहाँ पनाह वो मैं फूलदान को साफ करने के लिये ले गया था। अकबर – लेकिन साफ करने के लिए फूलदान को यहाँ से ले जाने की क्या ज़रूरत थी? सेवक रोने लगता है और कहता है – सेवक – जहाँ पनाह वो फूलदान मुझसे गलती से टूट गया। अकबर – लेकिन अभी तो तुमने कहा था कि तुम फूलदान साफ करने के लिए ले गए थे। मैं तुम्हे फूल दान टूटने के लिये तो माफ करता हूँ लेकिन मैं तुम्हे झूठ बोलने के लिए माफ नही करूंगा। मुझे झूठ से सख्त नफरत है। जाओ तुम्हे सल्तनत छोड़ने की सजा देता हूँ। सिपाहियों ले जाओ इसे। सेवक – जहाँ पनाह मुझे माफ़ कर दो मैं बहुत घबरा गया था, मुझे इतनी बड़ी सजा मत दो जहाँ पनाह रहम! जहाँ पनाह रहम! और सिपाही उसे खींचता हुआ ले गया, फिर अगले दिन राजा अकबर ने अपने दरबार मे ये किस्सा सुनाया। दरबार में बैठे सभी लोगो ने अकबर की इस बात की तारीफ की। वाह! जहाँ पनाह आपने बहुत अच्छा किया। झूठ कभी नही बोलना चाहिए। सभी लोग कहने लगे हमने तो कभी झूठ नही बोला। जहाँ पनाह बीरबल खामोश बैठे रहते हैं, अकबर बीरबल से पूँछते हैं। अकबर – बीरबल क्या हुआ तुम ख़ामोश क्यों हो? तुम्हारा क्या कहना है? क्या तुमने कभी झूठ बोला है? बीरबल – जहाँ पनाह ऐसा कोई नही होता जो कभी जिंदगी में झूठ न बोले कभी न कभी तो इंसान को झूठ बोलना ही पड़ता है। कभी-कभी इंसान इसलिए झूठ बोलता है कि हमारे सच से किसी को तकलीफ न हो। अपने आप को शर्म से बचाने के लिए भी इंसान झूठ बोलता है। इंसान को कभी न कभी झूठ बोलना ही पड़ता है। मैं कैसे कह दूं कि मैंने कभी झूठ नही बोला। अकबर – क्या, क्या! मैं ये समझू मेरे नौ रत्नों में से एक रत्न झूठा है। इस सल्तनत में सभी के लिए कानून बराबर है। जाओ तुम इस दरबार से निकल जाओ।बीरबल – लेकिन जहाँ पनाह मेरी बात तो सुनिए! अकबर – हम कुछ नही सुनना चाहते हैं, चले जाओ! तभी बीरबल वहाँ से चले जाते हैं। फिर क्या था बीरबल अब सोचने लगे के जहाँ पनाह को अब कैसे समझाया जाए। फिर क्या था बीरबल अपना दिमाग चलाने लगे और बहुत सोचने के बाद उन्होंने एक गेँहू की बाली ली और सेवक को बुलाया और सेवक से कहा – बीरबल – सेवक राम ये गेहूँ की बाली लो और शहर का सबसे अच्छा सुनार ढूंढो और एक ऐसी ही गेहूं की बाली सोने की बनबा कर लाओ, ध्यान रहे गेहूँ के दानों से लेकर बाली तक सभी सोने का होना चाहिए। सेवक – जी हुजूर मैं अभी जाता हूँ। और कुछ दिन बाद वो सोने की डाली लेकर अकबर के दरबार मे गए। अकबर – तुम्हारी हिम्मत कैसे हुइ दरबार में आने की तुम्हे यहाँ आने से मना किया था न। बीरबल – जहाँ पनाह मैं यही किसी औधे की हैसियत से नही बल्कि मैं एक नागरिक की हैसियत से आया हूँ। मैं आपको दुनिया की सबसे अमीर सल्तनत का बादशाह बनाना चाहता हूँ। ये देखिए सोने के गेहूं की बाली। अकबर और वहाँ मौजूद सभी लोग बहुत हैरान होकर उस बाली को देखते हैं। अकबर कहते है – अकबर – ये तो सचमुच सोने की बाली है ये तुम्हे कहाँ मिली? बीरबल – जहाँ पनाह ये कोई साधारण बाली नही है, ये मुझे एक ज्योतिषी ने दी थी, जो बहुत कड़ी तपस्या के बाद उन्हें मिली थी। जहाँ पनाह वो कोई साधारण ज्योतिष नही था, एक दिन वो जयोतिष मुझे नदी के किनारे मिला और वो ज्योतिष वहां नदी के पानी के ऊपर चल रहा था। इस तरह से जिस तरह हम जमीन पर चलते हैं। अकबर हैरान होकर पूछते हैं – अकबर – अच्छा इतने महान ज्योतिष हैं तो फिर चलो देर कैसी है इसे अभी खेत मे बो देते हैं। बीरबल – हाँ-हाँ जहाँ पनाह मैंने इसका इंतेज़ाम पहले ही कर रखा है। मैंने एक बहुत अच्छी जगह इसके लिए देख रखी है। हम कल सुबह इस बाली को वहाँ बोएंगे। अकबर – हाँ बीरबल हम कल सुबह ही इस बाली को बोयेंगेऔर ये सब को बता देना की हम ये सोने की बाली उस उपजाऊ ज़मीन पर बोने वाले हैं। बीरबल – जी जहाँ पनाह मैं कल सुबह ही आ जाऊंगा सब को ले कर। फिर अगले दिन अकबर और बीरबल बहुत से लोगो के साथ उस जगह पर आते हैं। बीरबल – जहाँ पनाह ये है वो जगह जिसके बारे में मैं आपको बता रहा था। अकबर – बीरबल तो देरी क्या है इस बाली को जाकर बो दो। बीरबल – मैं नही जहाँ पनाह, मैं इसे नही बो सकता हूँ। क्योंकि इस बाली को वही बो सकता है, जिसने कभी झूठ नही बोला हो। मैंने तो कई बार झूठ बोला है। आप ये काम किसी और से करबा लीजिये। अकबर वहाँ खड़े लोगों से पूछते हैं – अकबर – क्या आप में से कोई है जिसने कभी झूठ नही बोला है। वहाँ खड़े सभी लोग चुप रहते हैं, कोई आगे नही आता है। अकबर – हमे ये उम्मीद नहीं थी। बीरबल – जहाँ पनाह अब आप ही एक ऐसे शख्स हैं, जिसने कभी झूठ नही बोला। आप ही इस बाली को बो दीजिये। अकबर बहुत हिचकिचाते हैं और कहते हैं – अकबर – मैं, मैं कैसे, मैने भी कभी न कभी तो झूठ बोला है, बचपन में या फिर कभी और। बीरबल – जी जहाँ पनाह मेरे कहने का भी मतलब वही था। इंसान को कभी न कभी झूठ बोलना ही पड़ता है। या किसी को ठेस न पहुंचे इसलिए या फिर शर्मिदा न होना पड़े। कभी इसलिए और कभी कभी किसी अच्छे काम के लिए भी झूठ बोलना पड़ता है। और हाँ जहां पना मैंने वह बाली शहर के सुनार से बनबाई थी। ये मुझे किसी ज्योतिष ने नही दी थी। मैंने आप को समझाने के लिए ऐसा किया था। अकबर – हमे माफ कर दो बीरबल हमे ऐसा नही करना चाहिए। हम आपको निर्दोष करार करते हैं। तुम हमारे सच्चे मित्र हो हम समझ गए बीरबल। और इस तरह अकबर को अपनी गलती का एहसास हो गया। और अकबर ने उस सेवक को भी माफ कर दिया जिससे वह फूलदान टूटा था।



