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Harivansh Rai Bachchan Poems in Hindi
अग्निपथ
वृक्ष हों भले खड़े,
हों घने हों बड़े,
एक पत्र छाँह भी,
माँग मत, माँग मत, माँग मत,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।
तू न थकेगा कभी, तू न रुकेगा कभी,
तू न मुड़ेगा कभी,
कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।
यह महान दृश्य है,
चल रहा मनुष्य है,
अश्रु श्वेत रक्त से,
लथपथ लथपथ लथपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।
मूल्य दे सुख के क्षणों का
मूल्य दे सुख के क्षणों का!
एक पल स्वच्छंद होकर
तू चला जल, थल, गगन पर,
हाय! आवाहन वही था विश्व के चिर बंधनों का!
मूल्य दे सुख के क्षणों का!
पा निशा की स्वप्न छाया
एक तूने गीत गाया,
हाय! तूने रुद्ध खोला द्वार शत-शत क्रंदनों का!
मूल्य दे सुख के क्षणों का!
आँसुओं से ब्याज भरते
अनवरत लोचन सिहरते,
हाय! कितना बढ़ गया ॠण होंठ के दो मधुकणों का!
मूल्य दे सुख के क्षणों का!
आत्मपरिचय
मैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ,
फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूँ
कर दिया किसी ने झंकृत जिनको छूकर
मै सासों के दो तार लिए फिरता हूँ!
मै स्नेह-सुरा का पान किया करता हूँ,
मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ,
जग पूछ रहा है उनको, जो जग की गाते,
मै अपने मन का गान किया करता हूँ!
मैं निज उर के उद्गार लिए फिरता हूँ,
मै निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ
है यह अपूर्ण संसार ने मुझको भाता
मैं स्वप्नों का संसार लिए फिरता हूँ!
मैं जला हृदय में अग्नि, दहा करता हूँ,
सुख-दुख दोनों में मग्न रहा करता हूँ
जग भ्ाव-सागर तरने को नाव बनाए,
मैं भव मौजों पर मस्त बहा करता हूँ!
मैं यौवन का उन्माद लिए फिरता हूँ,
उन्मादों में अवसाद लए फिरता हूँ,
जो मुझको बाहर हँसा, रुलाती भीतर,
मैं, हाय, किसी की याद लिए फिरता हूँ!
कर यत्न मिटे सब, सत्य किसी ने जाना?
नादन वहीं है, हाय, जहाँ पर दाना
फिर मूढ़ न क्या जग, जो इस पर भी सीखे?
मै सीख रहा हूँ, सीखा ज्ञान भूलना!
मैं और, और जग और, कहाँ का नाता,
मै बना-बना कितने जग रोज़ मिटाता
जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव,
मैं प्रति पग से उस पृथ्वी को ठुकराता!
मै निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ,
शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ,
हों जिसपर भूपों के प्रसाद निछावर,
मैं उस खंडर का भाग लिए फिरता हूँ!
मै रोया, इसको तुम कहते हो गाना,
मैं फूट पड़ा, तुम कहते, छंद बनाना
क्यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए,
मैं दुनिया का हूँ एक नया दीवाना!
मैं दीवानों का एक वेश लिए फिरता हूँ,
मै मादकता नि:शेष लिए फिरता हूँ
जिसको सुनकर जग झूम, झुके, लहराए,
मैं मस्ती का संदेश लिए फिरता हूँ!
मैं क्यों अपनी बात सुनाऊँ?
जगती के सागर में गहरे
जो उठ-गिरतीं अगणित लहरें,
उनमें एक लहर लघु मैं भी, क्यों निज चंचलता दिखलाऊँ?
मैं क्यों अपनी बात सुनाऊँ?
जगती के तरुवर में प्रति पल
जो लगते-गिरते पल्लव-दल,
उनमें एक पात लघु मैं भी, क्यों निज मरमर-गायन गाऊँ?
मैं क्यों अपनी बात सुनाऊँ?
मुझ-सा ही जग भर का जीवन,
सब में सुख-दुख, रोदन-गायन,
कुछ बतला, कुछ बात छिपा क्यों एक पहेली व्यर्थ बुझाऊँ?
मैं क्यों अपनी बात सुनाऊँ?
दिल को छु लेने वाली कुछ पंक्तियाँ
यहाँ सब कुछ बिकता है , दोस्तों रहना ज़रा संभल के ,
बेचने वाले हवा भी बेच देते है , गुब्बारों में डाल के ,
सच बिकता है , झूठ बिकता है , बिकती है हर कहानी ,
तीन लोक में फैला है , फिर भी बिकता है बोतल में पानी ,
कभी फूल की तरह मत जीना , जिस दिन खिलोगे टूट के बिखर जाओगे ,
जीना है तो पत्थर की तरह जीओ , तराशे गए तो ‘ खुदा ‘ भी बन जाओगे |
प्यार किसी को करना , लेकिन
कहकर उसे बताना क्या
अपने को अर्पण करना पर
औरो को अपनाना क्या |
हलाहल पीना है तो देख
न आगे क्या हुआ परिणाम
नहीं मुख से बोले अपशब्द
पिया जब तूने मधु का जाम |
कोशिश करने वालो की
लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती
कोशिश करने वालो की कभी हार नहीं होती
नन्ही चींटी जब दाना लेकर चलती है
चद्ती दीवारों पर , सौ बार फिसलती है |
मन में विशवास रंगों में साहस भरता है ,
चढ़ कर गिरना , गिर कर चढ़ना न अखराता है
आखिर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती
कोशिश करने वालो की कभी हार नहीं होती |
डुबकियाँ सिन्धु में गोताखोर लगाता है ,
जा कर खाली हाथ लौट आता है
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में ,
बढता दुगना उत्साह इसी हैरानी में |
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती ,
कोशिश करने वालो की कभी हार नहीं होती |
असफलता एक चुनौती है ,इसे स्वीकार करो ,
क्या कमी रह गयी , देखो और सुधार करो ,
जब तक न सफल हो ,नींद चैन को त्यागो तुम ,
संघर्ष का मैदान छोड़कर मत भागो तुम ,
कुछ किये बिना ही जय जयकार नहीं होती ,
कोशिश करने वालो की कभी हार नहीं होती |
जो बीत गयी सो बीत गयी
जीवन में एक सितारा था
माना वह बेहद प्यारा था
वह डूब गया तो डूब गया
अम्बर के आनन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गये फिर कहाँ मिले
पर बोले टूटे तारो पर
कब अम्बर शोक मनाता है
जो बीत गयी सो बीत गयी |
जड़ की मुस्कान
एक दिन तने ने भी कहा था ,
जड़ ?
जड़ तो जड़ ही है ,
जीवन से सदा डरी रही है ,
और यही है उसका सारा इतिहास ,
कि ज़मीन में मुँह गुडाय पड़ी रही है ,
लेकिन में ज़मीन से उपर उठा ,
बाहर निकला , बड़ा हूँ ,
मज़बूत बना हूँ , इसी से तो तना हूँ |
एक दिन डालो ने भी कहा था ,
तना ?
किस बात पर है तना ?
जहाँ बिठाल दिया गया था वही पर है तना ,
प्रगतिशील जगती में , तिल भर नहीं डोला है ,
खाया है , मोटाया है , सहलाया चोला है ,
लेकिन हम तने से फूटी ,
दिशा दिशा में गयी
उपर उठी , नीचे आई |
चल मरदाने
चल मरदाने , सीना ताने
हाथ हिलाते , पाँव बढ़ाते ,
मन मुस्काते , गीत गाते |
एक हमारा देश हमारा
वेश , हमारी कोम , हमारी
मंजिल , हम किससे भयभीत |
चल मरदाने , सीना ताने
हाथ हिलाते , पाँव बढ़ाते ,
मन मुस्काते , गीत गाते |
हम भारत की अमर जवानी ,
सागर की लहरें लासानी ,
गंग जमुन के निर्मल पानी ,
हिमगिरी की ऊँची पेशानी
सबके प्रेरक , रक्षक , मीत |
चल मरदाने , सीना ताने
हाथ हिलाते , पाँव बढ़ाते ,
मन मुस्काते , गीत गाते |
जग के पथ पर जो न रुकेगा ,
जो न झुकेगा , जो न मुड़ेगा ,
उसका जीवन , उसकी जीत ,
चल मरदाने , सीना ताने
हाथ हिलाते , पाँव बढ़ाते ,
मन मुस्काते , गीत गाते |
नीड़ का निर्माण
नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्णान फिर-फिर!
वह उठी आँधी कि नभ में
छा गया सहसा अँधेरा,
धूलि धूसर बादलों ने
भूमि को इस भाँति घेरा,
रात-सा दिन हो गया, फिर
रात आई और काली,
लग रहा था अब न होगा
इस निशा का फिर सवेरा,
रात के उत्पात-भय से
भीत जन-जन, भीत कण-कण
किंतु प्राची से उषा की
मोहिनी मुस्कान फिर-फिर!
नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्णान फिर-फिर!
वह चले झोंके कि काँपे
भीम कायावान भूधर,
जड़ समेत उखड़-पुखड़कर
गिर पड़े, टूटे विटप वर,
हाय, तिनकों से विनिर्मित
घोंसलो पर क्या न बीती,
डगमगाए जबकि कंकड़,
ईंट, पत्थर के महल-घर;
बोल आशा के विहंगम,
किस जगह पर तू छिपा था,
जो गगन पर चढ़ उठाता
गर्व से निज तान फिर-फिर!
नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्णान फिर-फिर!
क्रुद्ध नभ के वज्र दंतों
में उषा है मुसकराती,
घोर गर्जनमय गगन के
कंठ में खग पंक्ति गाती;
एक चिड़िया चोंच में तिनका
लिए जो जा रही है,
वह सहज में ही पवन
उंचास को नीचा दिखाती!
नाश के दुख से कभी
दबता नहीं निर्माण का सुख
प्रलय की निस्तब्धता से
सृष्टि का नव गान फिर-फिर!
नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्णान फिर-फिर!
साथी , सब कुछ सहना होगा
साथी, सब कुछ सहना होगा!
मानव पर जगती का शासन,
जगती पर संसृति का बंधन,
संसृति को भी और किसी के प्रतिबंधो में रहना होगा!
साथी, सब कुछ सहना होगा!
हम क्या हैं जगती के सर में!
जगती क्या, संसृति सागर में!
एक प्रबल धारा में हमको लघु तिनके-सा बहना होगा!
साथी, सब कुछ सहना होगा!
आओ, अपनी लघुता जानें,
अपनी निर्बलता पहचानें,
जैसे जग रहता आया है उसी तरह से रहना होगा!
साथी, सब कुछ सहना होगा!
क्या करूं सवदेना लेकर तुम्हारी
क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूँ?
मैं दुखी जब-जब हुआ
संवेदना तुमने दिखाई,
मैं कृतज्ञ हुआ हमेशा,
रीति दोनो ने निभाई,
किन्तु इस आभार का अब
हो उठा है बोझ भारी;
क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूँ?
एक भी उच्छ्वास मेरा
हो सका किस दिन तुम्हारा?
उस नयन से बह सकी कब
इस नयन की अश्रु-धारा?
सत्य को मूंदे रहेगी
शब्द की कब तक पिटारी?
क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूँ?
कौन है जो दूसरों को
दु:ख अपना दे सकेगा?
कौन है जो दूसरे से
दु:ख उसका ले सकेगा?
क्यों हमारे बीच धोखे
का रहे व्यापार जारी?
क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूँ?
क्यों न हम लें मान, हम हैं
चल रहे ऐसी डगर पर,
हर पथिक जिस पर अकेला,
दुख नहीं बँटते परस्पर,
दूसरों की वेदना में
वेदना जो है दिखाता,
वेदना से मुक्ति का निज
हर्ष केवल वह छिपाता;
तुम दुखी हो तो सुखी मैं
विश्व का अभिशाप भारी!
क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूँ?
