बचपन : Hindi Poem on Bachpan

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बचपन : Hindi Poem on Bachpan

बचपन का भी वो  क्या दौर होता है
दुनियादारी का न कोई झंझट न झमेला होता है
दिल भी निर्मल पानी जैसा बहता है
स्वार्थ भावना का कुछ पता नहीं
शायद इसीलिए बच्चो में भगवन का रूप देखा जाता है
बचपन का भी वो क्या दौर होता है |

माँ की आँचल में जन्नत का एहसास होता है
पिता की हर बात पे डांट का एहसास होता है
दिल पे फिर भी किसी बात का असर नहीं होता है
बचपन का भी वो क्या दौर होता है

सुबह उठकर वो पांच मिनट और सोने की जिद्द
स्कूल न जाने  बहाने लगाना
स्कूल में जाकर वो होमवर्क के बहाने
कभी कभी तो अपने दोस्त का ही होमवर्क दिखा देना
क्योकि उस समय दोस्ती का मतलब ही नि स्वार्थ होता है
बचपन का भी वो क्या दौर होता है |

दोस्तों के खुद से नम्बर ज्यादा आ जाना
तनाव का कारण बन जाता है
भाई बहन को खुद के इलावा जो पड़ जाए डांट
तो जनाब सातवे आसमान तक पहुँच जाता है
अपने आप ही छोटी छोटी चीजों में ढूँढ लेता है ख़ुशी
बचपन का भी वो क्या दौर होता है |

एक अजीब सा दौर होता है बचपन
न रोने की वजह मिल पाती है
और हसने का बहाना ,
थक भी बिन वजह ही जाते है
सोने के लिए बिस्तर मिले न मिले
लेकिन न जाने कैसे आँख बिस्तर पर ही खुलती थी
सच में , बचपन का भी वो क्या दौर होता है |

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