Holika dahan story in hindi

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Holika dahan story in hindi

होली हिंदुओं के प्रमुख त्योहारों के रूप में मनाया जाता है | होली सिर्फ हिन्दू ही नहीं बल्कि सभी समुदाय के लोग बहुत ही हर्षोल्लास  के साथ मनाते है |होली के त्योहार के दिन लोग गले लग कर और एक दूसरे को रंग लगाकर मनाते हैं |

इस दौरान धार्मिक और फागुन गीत भी गाए जाते हैं होली की एक रात्रि पहले  होलिका दहन भी किया जाता है| इसके पीछे एक पौराणिक कथा भी है

हिरण्यकश्यप नाम का एक राक्षस था, जिसकी कथा श्रीमद् भागवत पुराण और विष्णु पुराण में भी आती है| जिसका वध नरसिंह अवतार में भगवान विष्णु जी द्वारा किया गया था | यह हिरना करण नामक स्थान का राजा था जो अभी वर्तमान में भारत देश के राजस्थान में स्थित है, जिसे हिंडौन के
नाम से भी जाना जाता है|

हिर्नाक्ष उसका छोटा भाई था, जिसका वध वाराह ने किया था |इस अत्याचारी राक्षस राज हिरण्यकश्यप ने तपस्या करके ब्रह्मा जी से वरदान पा लिया कि संसार का कोई भी जीव-जंतु, देवी- देवता, राक्षस या मनुष्य उसे मार ना सके , ना ही वह रात में मरे ना दिन में ना पृथ्वी पर ना आकाश में ना घर में ना बाहर यहां तक कि कोई शस्त्र भी उसे मार ना पाए| ऐसा वरदान पाकर वह अत्यंत निरंकुश बन बैठा|

अपने आप को भगवान समझने लगा | यहाँ तक कि वह लोगो पर अत्याचार करने लगा कि लोग भगवान के स्थान पर उसके नाम की स्तुति करें और उसकी स्तुति न किये जाने पर वह खूब अत्याचार करता और मार देता |

लेकिन भगवान की करनी ऐसी हुई कि हिरण्यकश्यप के यहां पर प्रहलाद जैसा परमात्मा में अटूट विश्वास करने वाला भक्त पुत्र पैदा हुआ | प्रहलाद भगवान विष्णु का परम भक्त था और उस पर भगवान विष्णु की कृपा दृष्टि थी| हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को आदेश दिया कि वह उसके अतिरिक्त किसी अन्य की स्तुति ना करें| प्रहलाद के न मानने  पर हिरण्यकश्यप उसे जान से मारने पर उतारू हो गया| उसने प्रहलादको मारने के अनेक उपाय किए|

कभी समुन्द्र में फेंक दिया , कभी पहाड़ की चोटी से नीचे गिरा दिया , लेकिन वह प्रभु कृपा से बचता रहा | हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को अग्नि से बचने का वरदान था | उसको वरदान में एक ऐसी चादर मिली हुई थी जो आग में नहीं जल सकती थी | हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका की सहायता से प्रहलाद को आग में जलाकर मारने की योजना बनाई | होलिका बालक प्रहलाद को गोद में उठा जलाकर मारने का उद्देश्य से वरदान में पाई हुई चादर को ओढ़ आग में जा बैठी , भगवान की कृपा से न जाने कहाँ से हवा का झोंका आया और चादर होलिका से उड़ कर प्रहलाद पर जा गिरी और होलिका वहीं जल कर भस्म हो गई | इस प्रकार प्रहलाद को मारने के प्रयास में होलिका की मृत्यु हो गई, तभी से होली का त्योहार मनाया जाने लगा |

फिर एक दिन हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को भरी सभा में बुलाया और प्रहलाद ने हिरण्यकश्यप को बोला कि कण कण में भगवान बसे हुए है , यहाँ तक कि इस खम्बे में भी भगवान है | हिरण्यकश्यप ने  जब  क्रोध और अभिमान में आकर उस खम्बे पर प्रहार किया तो  भगवान विष्णु नरसिंह अवतार में खंबे से निकलकर गोधूलि समय सुबह और शाम के समय का संधि काल में दरवाजे की चौखट पर बैठकर हिरण्यकश्यप को मार डाला | तभी से होली का त्यौहार मनाया जाने लगा |

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