महर्षि बाल्मीकि : जीवन परिचय , Maharishi Valmiki Jayanti in Hindi

महर्षि बाल्मीकि का जीवन परिचय

महृषि बाल्मीकि , हिन्दू संस्कृति के महान ग्रन्थ  रामायण के रचयिता , जिनका सम्पूर्ण जीवन हमे शिक्षा प्रदान करता है।  महर्षि बाल्मीकि के जीवन का प्रत्येक पहलु हमे बहुत कुछ सीखाता है। अपने परम तप और ज्ञान से उन्होने एक ऐसे ग्रन्थ की रचना की , जिसमे हमे मर्यादा , वचन का पालन , भ्रातृत्व भाव , पुत्र कर्तव्य , मित्रता , सेवक और एक सच्चे भक्त की छवि से अवगत करवाया।

कहते है महर्षि बाल्मीकि का जन्म ब्रह्मा जी के मानस पुत्र प्रचेता के घर हुआ  | जन्म लेते ही एक भीलनी ने उनका अपहरण कर लिया |इसीलिए उनका पालन पोषण भील समाज में हुआ | महर्षि बाल्मीकि का प्रथम नाम रत्नागर था , जो अपने परिवार के पालन पोषण के लिए लोगो को लूटते मारते थे |

महर्षि बाल्मीकि जी का जीवन क्यों है प्रेरणा दायक

राहगीरों  को लूटते मारते ही रत्नागर का जीवन व्यतीत हो रहा था और जरुरत पड़ने पर तो वह लोगो को मार भी देते थे |ऐसे करते करते उनके पापो का घड़ा भर ही रहा था  कि उनके जीवन को तारने के लिए जंगले में एक दिन नारद मुनि जा रहे थे की रत्नागर ने नारद मुनि को ही बंधी बना लिया | नारद मुनि ने बहुत ही सुशील स्वभाव से पूछा ,” हे मानव ! तुम ये दुष्करम किसके लिए कर रहे हो ?”

रत्नागर ने उत्तर दिया ,”में ये सब कुछ अपने परिवार के लिए कर रहा हूँ |” नारद मुनि बोले  ,” क्या इस दुष्कर्म के परिणाम में तुम्हारा परिवार साथ दे सकता है ?” जी हाँ , क्यों नहीं यदि में उन सब के लिए इतना कुछ कर सकता हूँ , तो वो इसके पाप में मेरे सहभागी क्यों नहीं बन सकते ? नारद मुनि के कहने पर जब उन्होंने घर जाकर सबसे पूछा तो सबने मना कर दिया और जब वो निराश होकर नारद मुनि के पास वापिस आये तो नारद मुनि ने उन्हें राम नाम का जाप करने को कहा |

इसी घटना से प्रेरित होकर महर्षि बाल्मीकि जी ने  राम नाम का जाप आरम्भ किया | माना जाता है कि ज्ञान न होने के कारण उनसे राम नाम का जाप सम्भव न हो सका | इसीलिए उन्होंने घोर तपस्या की और रत्नागर से महर्षि बाल्मीकि बने और प्रथम संस्कृत काव्य हिन्दू धर्म के महान ग्रन्थ रामायण की रचना की |

कैसे रचना हुई प्रथम श्लोक की

एक दिन गंगा नदी के तट पर एक सारस पक्षी का जोड़ा प्रेम क्रीडा में मग्न था | बाल्मीकि जी उनको बहुत देर से निहार रहे थे कि किसी ने नर पक्षी का वध कर दिया और मादा पक्षी को विरलाप करते देख बाल्मीकि जी के दुखी हृदय से ये श्लोक निकल गया |

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः |
                                                    यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम्॥
अर्थात जिस किसी ने भी यह घृणा योग्य कार्य किया है , काममोहित पक्षी को मार दिया है | उसे कभी भी जीवन में प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं होगी |

कैसे हुई रचना हिन्दू संस्कृति के महाग्रंथ रामायण की

माना जाता है कि इस श्लोक को बोलने के पश्चात स्वय ब्रह्मा जी प्रगट हुए और उन्होंने बाल्मीकि जी से कहा कि आपके मुख पर स्वयं सरस्वती जी ने बैठ कर यह श्लोक बुलवाया है | उन्ही की प्रेरणा से ही महाग्रंथ रामायण की रचना महर्षि बाल्मीकि जी ने की | माता सीता को अपने आश्रम में रख कर रक्षा करने वाले  और लव कुश को ज्ञान  देने वाले भी महर्षि बाल्मीकि ही थे |

वाल्मीकि जयंती कब और कैसे मनाई जाती है ? When and How We Celebrate Valmiki Jayanti

बाल्मीकि जयंती आश्विन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है |  हिन्दू धर्म में मान्यता होने के कारण  इसे पूरे भारत वर्ष में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है | इस दिन लोग
अपने घरो में मीठे पकवान बनाते है |
धार्मिक स्थलों पर भंडारे लगते है |
शोभा यात्रा निकाली जाती है |
लोगो को उनके जीवन से प्रेरणा लेकर पाप के मार्ग को छोड़ कर धर्म के रास्ते को अपनाने के लिए प्रेरित किया जाता है |

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