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Short Story About Ramayana in Hindi
रामायण जैसे महाकाव्य को कुछ ही शब्दों में लिखना सरल नहीं है , परन्तु फिर भी रामायण को अपने शब्दों में लिखने का प्रयास किया है | रामयण को एक कहानी के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश Short Story About Ramayana in Hindi में की गयी है |

रामायण प्रथम संस्कृत काव्य
रामायण , हिन्दू धर्म का पवित्र ग्रन्थ , जिस महाकाव्य के रचयिता महर्षि बाल्मीकि है | माना जाता है कि ब्रह्मा जी के आशीर्वाद से बाल्मीकि जी न प्रथम संस्कृत महाकाव्य रामायण की रचना की |
राम जन्म एवम शिक्षा
कहते है महाराज दशरथ की तीन रानियाँ थी – कौशल्या , कैकयी और सुमित्रा। उनके घर बहुत देर से संतान न होने के कारण उन्होंने महर्षि विशिष्ट की आज्ञा पाकर ऋषि श्रींगमुनि से पुत्र कामेष्टि यज्ञ करवाया , जिनकी कृपा मात्र से राजा दशरथ के घर चार पुत्रो का जन्म हुआ – राम , भरत , लक्ष्मण एवम शत्रुघ्न | राम जन्म के उपलक्ष्य पर ही राम नवमी का त्यौहार मनाया जाता है | चारो भाईयो में बचपन से ही बहुत प्रेम भाव था |
जब चारो भाई थोड़े से बड़े हुए , उन्हें समाज के दुसरे नागरिको को समान भाव की नज़र से देखने हेतु एवम वास्तविक संसार का ज्ञान करवाने के लिए उन्हें महर्षि विशिष्ट के आश्रम में शिक्षा प्राप्त करने के लिए भेजा गया , जहाँ पर वेह शिक्षा प्राप्त करने के साथ साथ आश्रम के लिए भिक्षा मांग कर लाते , लकडिया इकठी करते |
समय बीतता गया और चारो भाइयो की शिक्षा पूर्ण हो गयी और सभी वापिस महल में आ गये | उस समय राक्षस जाति का ब्राह्मण समाज पर कहर चरम सीमा पर था | महर्षि विश्वामित्र एक दिन राजा दशरथ के पास सहायता मांगने के लिए आये और अपने साथ राम को ले जाने के लिए प्रार्थना की | श्री राम के साथ लक्ष्मण भी महर्षि विश्वामित्र के साथ चले |श्री राम ने महर्षि विश्वामित्र की आज्ञा अनुसार राक्षसी ताड़का का वध करने पश्चात , अहल्या का उद्धार किया |
सीता जन्म इतिहास
चलते – चलते राम – लक्ष्मण महर्षि के साथ मिथिला नगरी पहुंचे , जहाँ पर राजा जनक की सुपुत्री सीता का स्वयंबर होने जा रहा था | माना जाता है कि एक बार मिथिला नगरी में बहुत सूखा पढ़ गया और यज्ञ करने उपरंत उन्हें हल जोतने के लिए कहा गया और सीता राजा जनक को धरती में से प्राप्त हुई थी |
राम सीता विवाह
राजा जनक ने स्वयंबर में आने वाले वीर पुरुषो के लिए शिव धनुष को तोड़ने के रूप में कड़ी चुनौती रखी थी | एक एक करके महाबलि आये और शिव धनुष को उठा भी न पाए |महर्षि विश्वामित्र की आज्ञा पाकर श्री राम ने शिव धनुष को न केवल आसानी से उठा लिया , अपितु उसे तोड़ भी दिया | माना जाता है कि श्री राम की वीरता और सादगी देख कर उन्होंने अपनी चारो बेटियों के विवाह अयोध्या के चारो राज कुमारो के साथ करने का निर्णय किया |
राम बनवास एवम दशरथ निधन
चारो बेटो के घर बसने के बाद राजा जनक ने निर्णय लिया – राम के राज्य अभिषेक का , जिसे सुन कर अयोध्या नगरी में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी , लेकिन वक़्त को कुछ और ही मंजूर था | अपने पुत्र भरत से भी ज्यादा राम को स्नेह देने वाली कैकयी के मन में मंथरा द्वारा भड़काने वाली बातें घर गयी और उसने रजा दशरथ से अपने दो वर मांग लिए . जिस में से एक राम का बनवास था और दूसरा भरत का राज्य अभिषेक |
उस समय भरत शत्रुघ्न के साथ अपने ननिहाल गया हुआ था एवम राम अपने पिता के दिए हुए वचनों का मान रखने के लिए वन जाने को तयार हो गये | उनके साथ सीता और लक्ष्मण भी उनके साथ वन जाने की हठ करने लगे | राजा दशरथ अपने अति प्रिय पुत्र राम का वियोग सहन न कर सके और पुत्र वियोग में उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए |
कहा जाता है कि भरत अपने भाई का हक कदापि नहीं लेना चाहते थे | इसलिए उन्हें जब यह ज्ञात हुआ कि उनकी वजह से उनके बड़े भाई राम को वन में भेज दिया गया है तो उन्होंने अपनी माता के इस फैसले का विरोध किया , लेकिन अपने भाईयो को वन जाने से न रोक पाए और श्री राम लक्ष्मण एवम सीता के साथ वन को चले गये |
शरूपनखा का नाक कटना
वन में जाकर श्री राम ने कई ब्राह्मणों के दर्शन किये | वन जीवन सुख दायक बीत रहा था कि एक दिन रावण की बहन स्रूपनखा लक्ष्मण को देख कर मोहित हो गयी , लेकिन लक्ष्मण ने गुस्से में आकर उकी नाक काट दी | वेह कटी हुई नाक लेकर अपने भाई के समक्ष गयी तो अपनी बहन को इस दशा में देख कर रावण बौखला उठा और उसने बदला लेने का ठान लिया |
सीता हरन
रावण सहायता लेने के लिए मायारूपी मारीछ के पास गया |उसके बहुत समझाने पर भी जब रावण नहीं समझा तो उसने रावण की बात मान ली और सीता हरण में सहायता करने के लिए विवश हो गया |मारिछ ने स्वर्ण मृग का रूप धारण किया और कुटिया के बाहर माता सीता की आँखों के सामने से निकला |कहते है समय बहुत बलवान होता है , बस उसी बल के कारण यह जानते हुए भी स्वर्ण मृग नहीं होता , सीता माँ श्री राम से स्वर्ण मृग की मांग कर बैठी और उनकी मांग पूर्ण करने के लिए वह उस मृग के पीछे दौड़े और श्री राम के तीर से मृग बच नहीं पाया |
जैसे ही उसे तीर लगा वह अपने वास्विक रूप में आ गया और लक्ष्मण का नाम लेकर चिल्लाने लगा | उसकी आवाज़ सुन कर सीता माता के जबरदस्ती करने पर लक्ष्मण श्री राम की रक्षा करने के लिए चला गया , लेकिन जाते जाते एक लक्ष्मण रेखा खींच गया कि कोई भी आये लक्ष्मण रेखा को पार नहीं करना है |अवसर पाकर रावण सीता का हरण करने के लिए साधू रूप में आया और भिक्षा की मांग की |
जैसे ही माता सीता अंदर से फल लेने गये , उसने लक्ष्मण रेखा को पार करने का प्रयास किया ,परन्तु कर नहीं पाया |उसने सीता को रेखा से बाहर आ कर भिक्षा देने के लिए कहा | जैसे ही वो रेखा से बाहर आये , उसने देवी सीता का हरन कर लिया |
जुटायु वध
रावण अपने पुष्प वाहन से देवी सीता को ले जा रहा था कि देवी सीता की रोने की आवाज़ सुन कर जुटायु उनकी सहायता के लिए आये , लेकिन रावण ने उनके दोनों पंख काट कर उन्हें बेबस कर दिया | देवी सीता ने अपने पहने हुए आभूषण धरती पर फेंक दिए ताकि श्री राम और लक्ष्मण को उन्हें ढूँढने में सहायता मिल जाए और दूसरी और श्री राम और लक्ष्मण सीता को कुटिया में न पाकर बेचैन हो गये और इधर उधर खोजने लगे |
खोजते खोजते उन्हें देवी सीता के आभूषण भी मिले और फिर जुटायु से मुलाक़ात हुई , जो केवल श्री राम के इंतज़ार में आखिरी साँसे ले रहे थे और उनकी सहायता से ही पता लगा कि देवी सीता का हरण करके लंका का राजा रावण ले गया है और उन्होंने ही रावण तक पहुँचने के लिए वानर राज सुग्रीव , जो कि रिशिमुख पर्वत पर रह रहे थे , के बारे में बताया |
हनुमान संगम एवम बाली वध
सुग्रीव जो वानर राजा बाली का छोटा भाई था | राजा बाली किसी युद्ध में गया हुआ था , बहुत दिनों तक उसकी प्रतीक्षा करने पर जब बाली घर नहीं आया तो सबके आग्रह से सुग्रीव का राज्य अभिषेक कर दिया गया , लेकिन जब बाली वापिस आया तो उसे लगा कि सुग्रीव ने उसे धोखा देकर उससे सारा राज्य छीन लिया है , इसी बात से गुस्सा होकर उसने सुग्रीव को अपने राज्य से निकाल कर उसकी पत्नी और राज्य को अपना बना लिया था |
बनवासी जीवन में भी श्री राम ने कईयों का उद्धार किया , जिसमे शबरी उद्धार अति प्रिय है , जिसके जूठे फल खाकर उसकी प्रतीक्षा भरी आँखों को तृप्त कर दिया | श्री राम और लक्ष्मण जब रिशिमुख पर्वत के पास पहुंचे तो सुग्रीव को शक हो गया कहीं उसके भाई बाली ने मानव रूप में किसी को सुग्रीव का पता लगाने के लिए भेजा है | इसीलिए उसने पता लगाने के लिए कि वो कहाँ से और किस कारण से आये है , हनुमान जी को भेजा |
यही वो समय था जहाँ पर हनुमान जी और श्री राम प्रथम समय मिले थे | पता लगने पर कि वो श्री राम और उनके भाई लक्ष्मण है , उनको आदर सहित सुग्रीव के पास लेकर गये | सुग्रीव ने श्री राम के साथ मित्रता का हाथ बढाया और श्री राम ने वचन दिया कि वो बाली का वध करके उन्हें वानर राज बना देंगे और सुग्रीव ने भी वायदा किया कि वह देवी सीता को खोजने और प्राप्त करने में उनकी सहायता करेगा |
हनुमान द्वारा सीता खोज
श्री राम ने वचन अनुसार बाली का वध कर दिया और सुग्रीव ने भी अपने वचन अनुसार चारो दिशायो में अपनी सेना को देवी सीता की खोज के लिए भेज दिया | खोजते खोजते वानरों की टोली जिसके नायक बाली पुत्र अंगद थे और साथ में हनुमान और जाम्वद थे , उनको रास्ते में जटायु के भाई मिले और उन्होंने देवी सीता तक पहुँचने का मार्ग बताया , लेकिन सागर पार कैसे जाया जाए , ये दुविधा सब को सता रही थी |
तभी जाम्वद जी के द्वारा हनुमान जी की शक्तियों को याद करवाने पर वह लंका पार उड़ कर गये और वहां जाकर सीता माँ की बेबस भरी ज़िन्दगी को देखा और उन्हें बताया कि वह श्री राम की और से आपका पता लगाने आये है और जल्दी ही श्री राम वानर राज सुग्रीव के साथ मिल कर आपको छुड़ा कर ले जायेगे और सीता माँ को विशवास आ जाए इसीलिए उन्होंने श्री राम के द्वारा दी गयी अंगूठी दिखाई | सीता माँ अंगूठी को देख कर भावुक हो गये और हनुमान जी को चूड़ामणि निशानी के तौर पर दी |
लंका का अग्नि दहन
हनुमान जी के द्वारा खाने के बारे में पूछने पर सीता माता ने उन्हें अशोक वाटिका के फलो को ग्रहण करने के लिए कहा | लेकिन रावण को श्री राम की शक्ति के बारे में अवगत करवाना भी आवश्यक था , इसीलिए सारी अशोक वाटिका एवम रावण की सेना को जब तहस नहस करने के बाद रावण के पुत्र अक्षय कुमार का संघार किया तो उन्हें बंधी बना कर रावण के दरबार में ले जाया गया |
हनुमान जी के अत्यंत प्रयास करने पर भी वह मूर्ख नहीं समझा और उनकी पूँछ को आग लगाने का आदेश दे दिया | हनुमान जी ने अपनी पूँछ को लम्बा किया और सारी स्वर्ण लंका को अग्नि की ज्वाला में झोंक दिया |पूरी लंका नगरी में जिसने हनुमान जी के मत का समर्थन किया वो रावण के भाई विभिषण थे | जिसने रावण को धर्म के मार्ग का अनुसरण करने के लिए प्रेरित करता रहता था , लेकिन रावण को उसकी बातों में देश द्रोह नज़र आता था |
नल और नील द्वारा राम सेतु
दूसरी और हनुमान जी द्मवारा सीता माता का पता लग जाने पर ख़ुशी की लहर दौड़ उठी थी और आशा की एक नयी किरण जाग उठी थी | अब समस्या यह थी की पूरी सेना के साथ सागर कैसे पार किया जाए , श्री राम जी सागर से रास्ता मांगे के लिए यज्ञ करने लगे | जब सागर ने स्वयं रास्ता नहीं दिया तो श्री राम के क्रोधित होने पर सागर ने उन्हें नल और नील दोनो भाईयो की शक्ति के बारे में अवगत करवाया कि वो जो भी कोई वस्तु समुन्द्र में फेंकेगे वो नहीं डूबेगी | फिर नल और नील की सहायता से समुन्द्र पर 1300 मील यानि 1 .8 किलोमीटर का लम्बा सेतु बनाया गया |
रावण को यह बात पता चलने पर अच्भित सा हो गया | विभिषण के द्वारा दोबारा से यह समझाये जाने पर कि श्री राम से शत्रुता हानिकारक हो सकती है , उसने विभिषण को देश निकाला दे दिया | देश निकाला दिए जाने पर विभिषण श्री राम की सेना में जा कर मिल गये | फिर भी रावण को अंतिम अवसर प्रदान करने के लिए अंगद को शान्ति दूत के रूप में भेजा गया , लेकिन फिर भी रावण नहीं माना और लंका पर श्री राम ने सुग्रीव , विभिषण एवम वानर सेना की सहायता से आक्रमण कर दिया |
कुम्भकरण वध
रावण ने सबसे पहले अपने भाई कुभ्करण को युद्ध करने के लिए याद किया | कुम्भकरण रावण का छोटा एवम विभिषण से बड़ा भाई था ,माना जाता है कि जब कुम्भकरण अपनी कठोर तपस्या के बाद ब्रह्मा जी से इन्द्रासन मांगने लगा तो उसकी जीह्वा पर सरस्वती माता आ बैठे और इन्द्रासन की जगह पर निन्द्रासन मांग बैठा , जिसके फलस्वरूप वह छह महीने सोता था और छह महीने जाग पाता था | जब वह युद्ध के लिए जाने लगा तो उसके द्वारा भी रावण को श्री राम की शक्तियों से अवगत करवाने का प्रयास विफल रहा और अपने भाई का साथ देने के लिए कुम्भकरण युद्ध भूमि में गया और श्री राम के हाथों वीरगति को प्राप्त हुआ |
मेघनाथ एवम रावण वध
ऐसे ही वीर योधा एक एक करके आये और वीरगति को प्राप्त हो गये | कहते है रावण का पुत्र मेघनाथ की वीरता को टक्कर देने वाला कोई नहीं था | उसकी वीरता के आगे एक बार तो लक्ष्मण सहित श्री राम भी मूर्छित हो गये थे , फिर हनुमान जी ने गरुड़ को बुला कर उनका नागपाश से मुक्ति दिलाई थी और दूसरी बार तो लक्ष्मण को अपनी बरछी मार कर मूर्छित कर दिया था , फिर हनुमान जी द्वारा संजीवनी बूटी लाने पर उन्हें सजीव किया गया , इसीलिए हनुमान जी को संकटमोचन के नाम से भी पुकारा जाता है |
फिर विभिषण के द्वारा सहायता किये जाने पर और मेघनाथ के निकुम्भ्ला देवी के मंदिर में जाकर उसके यज्ञ को विध्वंस कर दिया , जिसके फलस्वरूप वह वीरगति को प्राप्त हुआ |रावण को भी मारने का गुप्त रहस्य बताकर विभिषण ने श्री राम को विजय पाने में सहायता दी|
रावण दहन एवम अयोध्या वापसी
जिससे धर्म की विजय हुई और अधर्म का विनाश हुआ | बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक यह दिन दशहरा के रूप में मनाया जाता है | जब सीता माँ को रावण के महल में से वापिस श्री राम के पास लेकर आये तो सीता माँ के आचरण पर समाज में कोई उंगलियाँ न उठे , इसीलिए श्री राम ने उनकी अग्नि परीक्षा ली और वापिस विभिषण द्वारा प्रदान पुष्प वाहन में वापिस अयोध्या आये , जो दीपावली के रूप में आज भी बहुत धूम धाम से मनाई जाती है | भरत ने सारा राज्य अपने बड़े भाई को सौंप कर सुख की सांस ली |
